चर्चाएं चल रही हैं
आरोप उछाले जा रहे हैं
वक्तव्य भी जारी होते रहते हैं
समय-समय पर।
ठ॔ड बढ़ती जाती है
खुले आसमान के नीचे
लोगों का मरना और धरना प्रदर्शन जारी है।
क्या होगा पता नहीं
स॔वेदना विहीन लोग बढ़- चढ़ कर
बोल रहे हैं, विश्लेषण कर रहे हैं।
समस्या जस की तस है
कदम पीछे खींचना अस॔भव सा हो गया है
दोनों पक्ष अड़े हैं,पसोपेश में पड़े हैं
समय बीत रहा है, धैर्य चुक रहा है
परिस्थिति विकट है।
सब भला चाहते हैं परन्तु
अपने ही रास्ते पर चला चाहते हैं
ऐसे कैसे समाधान निकलेगा
जैसा चल रहा है
क्या वैसा ही चलता रहेगा
किन्तु कब तक?कब तक??कब तक???


