हमारा शरीर देहावसान के पश्चात प॔चतत्वों में विलीन हो जाता है। पांच तत्व हैं 'क्षिति,जल,पावक,गगन,समीरा '। गगन का अर्थ है आकाश,जिसे शून्य भी कहा जाता है।वास्तव में ऐसा है नहीं। अनेक प्रकार की गैसैं विद्यमान हैं जिनसे मिलकर वायुमंडल बना है। आकाश में तरह-तरह के बादलों की छटा देखने को मिलती है। ये बादल विभिन्न र॔गों के होते हैं। गिद्ध,चील,कौए,ह॔स,तोते,कबूतर इत्यादि अनेक प्रकार के पक्षी आकाश में विचरण करते रहते हैं। सुबह,शाम इनका कलरव गूंजता रहता है। ग्र॔थों में देवताओं द्वारा समय-समय पर आकाश में उपस्थित होकर पुष्प वर्षा के वर्णन मिलते हैं।युद्ध के समय रथों को आकाश में ले जाने के प्रस॔गों का उल्लेख मिलता है। मुनियों के हवन-पूजन में बाधा उत्पन्न करने हेतु राक्षसगण आकाश से ही दूषित सामग्री फेंकते रहते थे। आकाश मार्ग से ही वर्षा होती दीखती है।धूल भरी आंधी से आकाश लाल और मटमैला हो जाता है। इसका आभास पाकर विहगवृंद आकाश की ऊंचाइयों से अपने शरण स्थल को लौटने लगते हैं। आकाशीय बिजली गिरने पर जनहानि भी होती है। कहते हैं कि देवताओं का निवास आकाश में है। इंद्र के दरबार में अप्सराओं का नृत्य होता है और सोमरस का पान किया जाता है। अपने पाप पुण्यों के हिसाब से स्वर्ग और नर्क की प्राप्ति होती है। यमलोक भी वहीं है। उनके सहायक चित्रगुप्त की बही में सारा विवरण उपलब्ध होता है। अच्छा तो यही है कि हम आकाश में चमकते तारों का आनंद लें जिनके लिए कहा गया है- एक थाल मोती से भरा,सबके सिर पर औंधा धरा। दिन में जगत को जीवनदायिनी ऊर्जा देने वाला सूर्य और रात में शुभ्र ज्योत्सना से शीतलता प्रदान करने वाला च॔द्रमा भी तो आकाश में ही अवस्थित लगते हैं। ध्रुव तारा सदैव उत्तर दिशा को इंगित करता है।सौर मंडल में हम पृथ्वी वासी हैं और परग्रहीय आकाश से हमें क्या लेना देना।


