जब जरूरत थी दोस्त की....... दो-चार मिले।
मैं बावला कहा करता....बहुत यार मिले।
बहुत मिले यार..... अच्छे भी होंगे ।
सोचा नहीं था उम्मीदों में कच्चे भी होंगे।
कच्चे हम भी हैं दिल के बहल जाते हैं जल्दी।
देखकर दर्द किसी का पिघल जाते हैं जल्दी।
मैं रोया तो कौन था पोंछता आंसू ?
पूछता कौन? कितना दर्द हुआ है ।
खोज रहा था ,उनको बताता ,
दवा नहीं , चाहिए दुआ है।
एक अदद मदद इस जहां में यह है ,
पूछता गैर भी "तू कैसा है ?"
यहां तो कुछ लोग मुंह छुपा लिए
"अरे तू भाई जैसा है ।"
रह जाता है सूनापन, सन्नाटा जैसे रात का,
जब मन खाली होता पुराने बाशिंदों से ।
करते हैं तारीफ मुर्दों की ये ,
कोई चाव नहीं है जिंदों से।
मैं भूल नहीं पाता भूलकर भी ,
जैसे बैठ गया छाती शुलधर ही ।
वह चेहरे औ, आंखें झूलते हैं ,
रूखे सूखे हैं, कोई भाव नहीं ।
जब स्वार्थ था, तब पूछ थी,
जब डूब रहा था ,पूछ कहां ?
जब ऊपर उठा तो फिर पूछे ,
अरे सरजी! एक काम था।
मैंने जिस की सुख-कामना से
निज श्रम साध्य ज्ञान लुटाया।
बदले में उस "आभारी" से
बस "अवज्ञा" भार ही पाया ।
गाँव-गाँव का राग हृदय में ,
ग्राम जनों से मोह लगाया ।
"दूर-दूर" की आवाज नें ,
अलग ही अहसास दिलाया ।
जो सुनते थे सुख-क्षण में ,
मेरे मन की बातें ।
वे जान नहीं सके तब ,
चीखती उर की आघातें।
नदी में नाव डूब रहा था ,प्रिय जन व्याकुल बिलखाए।
उन अश्रुपूर्ण आंखों को भी , "गिद्धों" ने नोच खाए। आदमी के चोले में , लाल राक्षसी आंखें
इन की क्रूरता के सामने "जालिम" भी शर्माए।
बुरों की बुराई तो ठीक,
औषधियों ने जहर फैलाया है।
वह भूल गए अच्छे पल, हमने साथ बिताया है।
दुर्दिन भी देखे हैं मैंने, फिर भी साथ निभाया ।
जब बारी उनकी आई, वह मौन मानो माया ।
किंतु अब मैं देख रहा आकुल होकर,
आतुर मन हँसकर -रोकर ,
भाग्य निठुर उन पर भी कभी हँसेगा,
तब देखूंगा ....दृश्य आँख धोकर ।
भलमनसाहत छोड़ कुछ पल मैं उन्हें निहारुँगा।
अपने उर के उठते सुभाव को मारूंगा।
फिर "राम"कहूंगा , मौन हो जाऊँगा,
शांत अपना रूप नया धारुँगा।
किंतु उस पीड़ा में जिन प्रियजनों का साथ मिला।
जुड़े हुए और वरमुद्रा में सुंदर जिनका हाथ मिला।
उनको जीवन भर अपने आंखों में बिठलाऊँगा।
श्री रामचंद्र के बाद ,नित्य शीश उन्हें ही झुकाउंगा।
उनके उर के सद्भाव का मोल चुका ना पाऊंगा ।
इसलिए उन्हीं के हित में नित प्रार्थनाएं गाऊंगा।
- राज कुमार जायसवाल
