भरा जलधि में, जितना जल, समस्या का, नहीं हल है।

धरे हैं हाथ में जो हल, जलद से आश केवल है।

उठा कर कर युगल अपने, प्रभो से माँग करते हैं,

मिले उनको वही खुशियाँ, धनी के साथ पल-पल है।


मिटाते भूख जग की जो, पसीने से नहाते हैं।

मिला ना रूप का वैभव, सदा ही धूप खाते हैं।

भटकते हैं कि मंडी में, फसल का दाम मिल जाए,

बने मजबूर फिरते हैं, तभी मजदूरी पाते हैं।


रहा है भाग इनका ही , सदा से क्यों भला खोटा।

कभी सूखा, कभी वर्षा, कभी पैसों का है टोटा।

बिलखते बाल-बच्चे हैं, अगर बुखार हो जाए,

पिता क्यों छोड़ देता जग, कि मानो मौत हो छोटा।


नहीं होता कहीं रुतबा, सदा ही आम होता है।

महज दो-चार रुपयों के, लिए बदनाम होता है।

झगड़-बेचैन मंडी में, किसी ने झूठ जो तोला,

उसी का अन्न खाकर के, हमें आराम होता है।


करे खेती, बदन धोती, मगर कुर्ता नहीं पहना।

झलकते स्वेद के मोती, कहे मेरा यही गहना।

यही एक ख्वाब है मेरा, कि मन में प्रार्थना मेरी,

चले जो कार ले किसान, अहो! क्या बात! क्या कहना!