सियाचिन की कड़क ठण्ड हो
या हों वो सारंडा के जंगल
सूरज की तपती दोपहरी हो
या रात की सरसराती ठण्ड
अपना घर बार छोड़ जाना हो
और महीनों तक न मिल पाना हो
अचानक दुश्मन का हमला हो जाना हो
या दुश्मन की गोली लग जाना हो
दुश्मन को घुस के मारना हो
और जीत का तिरंगा फैलाना हो
जो लड़ रहे भारत माँ की हिफ़ाज़त के लिए
करता हूँ मैं अभिषेक, नमन उन रखवालों के लिए