शरीर जब थकता है तो मांगता है एक नरम बिस्तर और थोड़ा आराम... सूखा कंठ मांगता है ग्लास भर शीतल जल यात्रा से थके हुए पैर मांगते हैं कुनकुना नमक घुला पानी दिनभर पोथियाँ पढ़कर थक चुका मस्तिष्क माँगता है थोड़ी सी नींद। कविता लिखने से पूर्व कवि का शांत चित्त मांगता है थोड़ी सी बेचैनी... समाज के बंधनों से बंधकर पृथक हुए दो प्रेमी मांगते हैं थोड़ी सी आज़ादी और आत्माओं का आलिंगन वर्षों के व्यभिचार से थक चुकी व्यभिचारिणी मांगती है खाली बिस्तर और अपनी करवटें तीन पहर के दिन में दो रोटी से गुज़ारा करने वाला मज़दूर मांगता है एक और अदद रोटी कचड़े से भरी टाट की बोरी ढोते-ढोते लगभग टूट चुके नाज़ुक काँधे मांगते हैं मुलायम टेक और किताबों की ख़ुश्बू नाम और पैसे की लिप्सा में स्वार्थ और प्रपंच में लिथड़ा ज़मीर मांगता है अंजुली भर इमान का पानी
जीवन रूपी झंझावात से लड़ लड़कर अपने अंतिम क्षणों में सोचता हूँ, कि मैं शायद मांगूंगा अपने प्रिय कवि की कविताओं की ओढ़नी जिसे ओढ़कर चैन से से सोया जा सके.


