जिस लहर में गूँज थी 

वह गूँज भी क्या गुनगुनी 

औंचक अकेली अधकटी 

बैठी । 


बैठी निहारे जा रही उड़ते तटों पे 

बिंदुओं के उन कड़ों की छाप 

जो चलती बिछलती उग्र-सी उद्द्गारती है 

दाग। 


दाग जो थे नदारत जिस्म पर 

पर बैठे ठसक मस्तिष्क पर 

झिंझोड़ते हैं उन् क्षणों की 

ताप। 


ताप जो जलती-बुझती 

तड़प रही है , आशियाने

की अंगड़ाइयों में और इसकी खाईयों में

दिन - रात। 


दिन - रात, उठती-बैठती हो खड़ी

गुनगुनाती चल पड़ी गूँज,

औंचक अकेले अधकटी 

बैठी। 


- राहुल राय