उत्तर नहीं, बस प्रश्न कई, तुम सुनना उनको अच्छे से ,

ये प्रीत परायी बैर नहीं, ये धागे नहीं हैं कच्चे से ।। 


तुम सीरत की सुंदरता ले, मेरी राहों पे चल देना

और मैं शब्दों के बना ग़ज़रे, मोह लू तुम्हे बिन गहना ।

तुम सज़ा के यूं ही जुड़े को, महकाना फिर मेरी बगिया

मैं ले मयूर-पंख, संग इठलाऊँ, जैसे कृष्ण-कन्हैया ।

फिर प्रेम सुधा के रस से, इक रास रचाऊँ सच्चे से

ये प्रीत परायी बैर नहीं, ये धागे नहीं हैं कच्चे से ।। 


तेरी आख़ियन के घोर अंधेरों को मैं काज़ल स्याह बना दूंगा

तुम फिर थोड़ा सा इतरा के, कर लेना कजरारे नैना ।

जो फिर दर्द बटें, तेरी आहों से, मैं तुझको हँसाउं अच्छे से

ये प्रीत परायी बैर नहीं, ये धागे नहीं हैं कच्चे से ।।


ले फिर झपट कुछ किस्सो को, जो कुछ पकाऊ मैं ख्याली

तुम देखना उनमें अश्कों को, न देखना मेरी बदहाली ।

ये मिरे ख़्वाब, ये मिरे किस्से, ये हैं उलझे कुछ लच्छे से

ये प्रीत परायी बैर नहीं, ये धागे नहीं हैं कच्चे से ।। 


मेरे शब्दों की मूरत, मेरे ख्यालों की मृगतृष्णा तुम

है "हम" के देखे जो ख्वाब, उन ख़्वाबों का आसमां तुम ।

ये लफ़्ज़ों के खेल खिलौने, मैं इनसे खेलूं बच्चे से

ये प्रीत परायी बैर नहीं, ये धागे नहीं हैं कच्चे से ।।