हम संग हैं तो संग का, दम्भ होना चाहिए ।
जंग ऐसी हो कि शत्रु, दंग होना चाहिए ।।
अंग चाहे भंग हो, ना मन मेरा अपंग हो।
हो हौसला दबंग, ऐसा ढंग होना चाहिए ।।
मृत्यु कापें आज तुझसे, वो प्रचंड रूप धर ।
खंड खंड होवे शत्रु, का घमण्ड चूर कर ।।
माँ भारती को घूरती, आंखों को ऐसा दंड दे ।
पैर रख के छाती पे, धड़ से मुंड दूर कर ।।
झुंड में ही आएंगे, वो उदंड स्वान अब ।
सिंह बन लहू से उनके, रक्त कुंड पूर कर ।।