क्या करूँ संताप तुम्ही से
अंतरतम की बात प्रिये
भूल गए हो सहजता से
मैं कैसे भूलू वो गात प्रिये
रक्त का संचार तुम सुचारू थी
भूल कैसे जाऊँ जो इतनी प्यारी थी
तरुण गाथा मे गाकर क्या करूँ इससे अच्छा है
तुम्हारी याद मे मरूँ पुलकित सा है
खिलता था एक फूल मेरे मानस मे
क्या बीभत्स था वो भूल मेरी था
दैत्य विकट अमावस मे चिर चेतना से क्या रहूँ
जब याद है
जाती नही क्या करूँ सब पुतलों का कोई मूरत भाती नही
अरि रज माथे लगाकर मैं तू हूँ
अब चूमता है स्पष्ट दिखते ख़ार थे कलिया समझ न चूमता