कितना अपना सा लगता है ये शहर
मीलों का सफर, बस के धक्के, जाम हुए चक्के,
फिर भी रोज मंजिल तक का सफर।
सुबह सवेरे होते ही निकल जाना
25 मिनट की पैदल दूरी फिर मेट्रो की सवारी
फिर बदलो मेट्रो फिर पैदल चलना
2 घंटे के बाद आया वो विद्या का मंदिर
जहां जाने से मेरा मन कभी नही थकता
बीते सात वर्ष मैंने इसकी पूजा की हैं
इसने मुझे समाज में इज्जत के साथ रोटी दी है।
इसने कर्म , समय, प्रेम , त्याग, सबका महत्त्व सिखाया है
सिखाया है मुझे हालातो से निकलना
खुद को जलाके चिरागाह बनाना
अपनी इच्छाओं को स्वार्थ न बनने दे
