देखो यह रेल कहा ले जाती है
इसका तो रोज का आना जाना है
मुसाफिरो से दिल नहीं लगाती है
आज मैं भी इसमें बन मुसाफिर बैठा हू
देखो मुझे कहा ले जाती है
भरी आंखे छोड़ आए हैं पीछे
खाली बाहें छोड़ आए है पीछे
मन की सुने तो पेट ना जीने देगा
पेट की खातिर सुख छोड़ आए है पीछे
नए सफर पर निकले है
एक सफर अधूरा छोड़ आए है पीछे
अकेले बैठे है खिड़की को निराहे
कैद करने को शहर के नजारे
अब जा रहे है पता नहीं कब लौटेंगे
कब पुकारे यह रेल
आजा वापस लेके चलू तुझे प्यारे!
