शहर की आँखों पर चश्मे लगे है बनावट के
व्यवहार की छोड़ो,सिर्फ किस्से है मिलावट के
यहाँ दूर से ही, हाथ हिला ,"हाय, हैल्लो" कर चले जाते है
मेरे गाँव में बर्तन भी खाली नही लौटाए जाते है
शहर में बालो के साथ साथ सब्जियों को भी रंगा जा रहा है
इंजेक्शन लगी सब्जियों को ताज़ा बता बेचा जा रहा है
शाम होते ही ये दवाइयों वाले फल-सब्जियां मुरझा जाते है
मेरे गाँव मे बिना दवाइयों के ये सब हर समय मुस्कुराते है।
शहर में लोग दौड़भाग से थक, रात को ही सबेरा बना लेते है
अपनो से बेख़बर, सोशल मीडिया को ही बसेरा बना लेते है
यहाँ फुर्सत में भी आपस मे मिल बैठ कर नही बतियाते है
मेरे गांव में आज भी हर शाम यूँही चौपाल लगा लेते है।
शहर में लोग एक दूसरे से अंजान घूमते है
मशीनों की भीड़ में रहकर इंसान ढूंढते है
ये वही लोग है जो शहर के शोरगुल में गांव ढूंढते है
और हाथ में कुल्हाड़ी लिए पेड़ की छांव ढूंढते है।
देख रहा हूँ कि गाँव को शहर धीरे धीरे निगलता जा रहा है
गाँव के लोगो को शहर के झूठे सपने बेचता जा रहा है
सवाल कर रहा है कि क्या रखा है बरगद की छांव में
और पहिये पलायन के बांध रहा है उनके पाँव में।
मैं जानता हूँ सपना है तुम्हारा विकास का झंडा फहराना
उँच्ची उँच्ची इमारतें और नए नए कारखाने लगाना
मैं चाहता हूँ कि खूब प्रगति करे ये शहर तुम्हारा
लेकिन मेरे गांव की लाश पर अपनी सफलता का परचम न लहराना।


