हाय! ये घोर अँधकार कैसा वज्रपात बन आया है

क्यों काल का साया मेरे भाई पर मंडराया है

तुम बिन मेरा क्या होगा, क्यों मौन हो अनुज

किसी अपने के खोने का दुःख कैसे सहता है मनुज

रण अग्नि में तुम्हारी आहुति दे, किया है मैंने घोर पाप

जीवन भर भातृ वियोग में जलू, यही है मेरा पश्चाताप

यदि यही से रण छोड़ चलू तो सीता जीवंत बचेगी क्या?

लंका जीत उसे लेने जाऊ, तुम बिन वो लौट चलेगी क्या?


जब तुम्हे यह ज्ञात हुआ कि मुझे भोगना है वनवास

मेरे व सीता की सेवा हेतु छोड़ आये सब भोग विलास

तुम्हारी रक्षा सर्वोपरि देकर आया था ये वचन

माँए रो रो कर प्राण त्यज देंगी जब पहुँचूँगा तुम बिन लखन

जब प्रश्न करेगी उर्मिला, क्या मुझे मिला है कोई श्राप

आप अनुज बिन यहाँ आये क्यों ,क्यों भोगू मैं ये संताप

उसके नैनो की अश्रु धार व प्रश्नो का उत्तर न दे पाउँगा

या पाषाण सा खड़ा रहूँगा या टूट कर वही बिखर जाऊंगा


वचन दिया था तुम्हे विभीषण

लंका का राज तुम्हे दिलवाऊंगा

अब तो ये चाप न उठेगा मुझसे

बिन लखन अब समर में न जाऊंगा

तो तुमको ये नीति समझाता हूँ

अब रघुकुल रीति निभाता हूँ

अपना वचन टूटने से पहले

मैं स्वयं देह त्यज जाता हूँ


एक पल को लगता है कि शिव बन खोलू तीजी आँख

क्या लंका क्या पाताललोक, सब जलाकर कर दू मैं राख

ऐसे क्या कर्म किए कि भोगू मैं ये समय

एक बाण चला सारी सृष्टि पर ला दू मैं प्रलय

पर दूजे पल लगता है ऐसा करने से होगा क्या

क्या तुम फिर से बोलोगे और मेरा विरह मिटेगा क्या

स्वार्थसिद्धि में तुम्हे खो दिया मुझसा पापी होगा कौन

पत्नी हेतु भाई खो दे ऐसा कपटी मिलेगा कौन


तुम जब साथ थे तो भय भी मुझसे थर्राता था

क्या दानव क्या असुर, काल भी घबराता था

तुम बिन ऐसा लगता है कि जल बिन मछली हूँ मैं

शुण्डिका बिन गज,पर्ण बिन तरू और पँख विहिन पँछी हूँ मैं

क्या ये विरह की रात्री कभी कट पायेगी

क्या जीवन का सूर्य उदित हो पायेगा

तुम बिन लखन अब मैं न जी पाउँगा

और ये राम कभी पुरुषोत्तम न बन पायेगा।