आओ तुमको बतलाता हू ऐसे वीर की कथा
मन विचलित हो जायेगा सुनकर उसकी व्यथा
भास्कर का वह अंश था, चेहरे पर तेज था उसके
तन पर तेजोमय कवच, कानो में कुण्डल थे उसके
लोकलाज से भयभीत हो गंगा में बहा दिया उसे
माँ राधे और पिता अधिरथ ने सहर्ष अपनाया उसे
शास्त्रों से उसको प्यार था
सारथी बनाना अस्वीकार था
गुरु द्रौण को वह शिष्य रूप में स्वीकार न था
उनके गुरुकुल में सूतपुत्र को प्रवेश का अधिकार न था
परशुराम को गुरु बना सीखी उसने सारी युद्धकला
किन्तु सूतपुत्र का भेद छिपा उनसे भी एक श्राप मिला
अर्जुन की वीरता के चर्चे दूर दूर तक थे
उसकी धनुर्विद्या को देखकर स्वयं देवता भी नतमस्तक थे
हस्तिनापुर की उस रंगभूमि में अर्जुन जैसा पारस न था
उसके शौर्य को ललकार सके ऐसा किसी वीर में साहस न था
कर तलो की ध्वनि के बीच एक योद्धा उस रंगभूमि में आया
अर्जुन को ललकारते हुए उसने अपना बाण चलाया
उसकी युद्धकला को देख सभी मंत्रमुग्ध थे
क्या द्रौण क्या कृप स्वयं भीष्म भी स्तब्ध थे
किन्तु उसका अर्जुन को ललकारना किसी को प्रिय न था
क्योकि वह जात से सूतपुत्र था, क्षत्रिय न था
तब दुर्योधन ने उसे मान दे अपना मित्र बनाया
तभी से वह अंग देश का राजा 'अंगराज' कर्ण कहलाया
अब युद्ध की घडी निकट थी
विपदा बहुत ही विकराल और विकट थी
कर्ण सर्वश्रेष्ठ है यह जान कृष्ण कर्ण के पास जाते है
तुम कौन्तेय हो यह बतला पांडवो के साथ आने के लिए मनाते है
मैं आपका प्रस्ताव अस्वीकार करता हूँ, होकर करबद्ध
मरते दम तक दुर्योधन के साथ रहूँगा, हूँ मैं वचनबद्ध
मुझे ज्ञात है की मेरी हार निश्चित है
किन्तु दुर्योधन का ऋणी हूँ और मेरी मित्रता अमिट है
मित्र के प्रति कर्ण की निष्ठा देख कृष्ण भी प्रसन्न हो जाते है
उसके निर्णय को सहर्ष स्वीकार कर वापस लौट आते है
कर्ण का निर्णय सुन स्वयं देवराज इंद्र भी घबरा जाते है
अपने पुत्र अर्जुन की प्राणरक्षा हेतु भिक्षुक बन चले आते है
इंद्र को ज्ञात है जब तक कर्ण के पास कवच और कुण्डल है
तब तक युद्ध में अर्जुन की हार पूर्णरूपेण अटल है
कर्ण सब जानते हुए भी कवच और कुण्डल दान में दे देते है
युद्ध में अपराजित रहने की अंतिम संधि से भी हाथ धो लेते है
युद्ध अब निश्चित है यह सुन कुंती भी कर्ण के पास जाती है
उसको अपने पुत्र होने का बोध कराती है
ज्येष्ठ पांडव होने के नाते कौरवों का साथ छोड़
पांडवो की ओर से लड़ने के लिए मनाती है
यदि मुझे उस दिन रंगभूमि में कौन्तेय कह कर बुलाया होता
तो आज यूं हम सब पर युद्ध का बादल न छाया होता
फिर भी युद्ध के पश्चात् पांडवो के पांच ही रहने का वचन देता हूँ
और युद्ध में केवल अर्जुन को ही हत करने की शपथ लेता हूँ
हताश कुंती जाते हुए भी कर्ण के महादानी होने को प्रमाणित कर जाती है
उससे 'नागास्त्र' का केवल एक ही बार प्रयोग करने का भी वचन मांग लाती है
युद्ध में कर्ण महाकाल बन कर खड़े है
सैकड़ो वीरो पर अकेले ही भारी पड़े है
उनके बाणो की वर्षा से
न जाने कितने योद्धा भयभीत और न जाने कितने मृत पड़े है
कर्ण का यह रौद्र रूप देख कृष्ण भी व्यथित बड़े है
कैसे बचाऊ पार्थ को कर्ण से इसी सोच में पड़े है
युधिष्ठिर, भीम ,नकुल और सहदेव को न जाने कितनी बार परास्त किया है
किन्तु वचनबद्ध होने के कारण हर बार उन्हें जीवनदान दिया है
पार्थ को हत करने हेतु कर्ण और भी हिंसक हुए जा रहे है
पार्थ से युद्ध हेतु शल्य को कृष्ण के पीछे लगाए जा रहे है
अब दो महावीरों के बीच घमासान युद्ध जारी है
कभी पार्थ का तो कभी कर्ण का पलड़ा भारी है
यह युद्ध अब कभी समाप्त न होगा ऐसा प्रतीत होता है
देखे कौरवो और पांडवो में से कौन पहले किसे खोता है
कृष्ण की प्रतीक्षा समाप्त हुई कर्ण पर संकट छाया है
रथ का पहिया धंसा और परशुराम का श्राप निकट आया है
अभी कर्ण का वध न किया तो यह काल बन पांडव सेना पर छायेगा
और इतिहास में अधर्म की धर्म पर जीत का पाप तुम्हारे सिर आएगा
यह सुन पार्थ ने अपना गांडीव उठाया और मंत्रोच्चार के साथ बाण चलाया
कर्ण का सिर धड़ से अलग हुआ, कुरुक्षेत्र में धूमिल हो गयी उसकी काया
योद्धा वो महान था सर्वशक्तिमान था
पांडव भी करे नमन ऐसा बलवान था
ऐसे वीर के निधन पर समस्त देवतागण भी व्याकुल हुए
कौरवो के साथ साथ स्वयं कृष्ण भी शोकाकुल हुए
पार्थ के सारथी कृष्ण थे,ध्वज पर हनुमान थे
युद्ध में कर्ण अकेला था, पार्थ के साथ भगवान थे
अकेला ही युद्ध में ऐसा लड़ा था
लाखो वीरो पर भारी पड़ा था
वचनबद्ध था इसीलिये अधर्म के साथ खड़ा था
मित्रता निभाने हेतु दुर्योधन के साथ लड़ा था
यदि न दिया होता कुंती को पांडवो के पांच रहने का वचन
तो आज पांडवो के हत होने पर नियति भी करती रुदन
कभी न सोचा उसने स्वयं के लिए क्या हितकारी था
मिला न उसे कभी कुछ जिसका वो सच्चा अधिकारी था
बस इतनी सी है उस दानवीर पराक्रमी की कथा
मन विचलित हो जाता है सुन से इस वीर की व्यथा


