समय बड़ा भयंकर है

सृष्टि विनाश प्रलयंकर है

नाग की भाँति हुंकार भरे

जन जन हाहाकार करे

निकलेंगे लेश कूप से

अपने दृढ़ स्वरुप से

आज संताप का मौन है तो क्या कल फिर हर्ष की लहर होगी

आज रात अमावस सी है तो क्या कल फिर एक नयी सहर होगी


पथ में अवरोध कई आये

पग में शूल चुभते जाये

अनल वर्षा भरपूर है

गंतव्य अभी दूर है

देखो ये साथ नहीं छूटे

देखो ये सांस नहीं टूटे

आज सफर मुश्किल है तो क्या कल फिर आसान डगर होगी

आज रात अमावस सी है तो क्या कल फिर एक नयी सहर होगी


कर वाद अपने अंतर्मन से

जो विष निकला सागर मंथन से

शिव बन ये विष पीना होगा

भोले की भाँति जीना होगा

तू धीर धर, हताश मत हो

जीतेंगे हम, निराश मत हो

आज विष का प्याला है तो क्या कल फिर अमृत नहर होगी

आज रात अमावस सी है तो क्या कल फिर एक नयी सहर होगी


दुःख का बदल मंडराया है

घनघोर अँधेरा छाया है

हो रात भले ही लंबी कितनी

दिनकर को कौन रोक पाया है

फिर दीपोत्सव मनाना है

ध्रुव की भाँति जगमगाना है

आज लौ धीमी है तो क्या कल फिर ज्योति प्रखर होगी

आज रात अमावस सी है तो क्या कल फिर एक नयी सहर होगी