रमणिक रसमयी रूचिर रात में
चारु चंद्र का विचरण देखा
निश्चल निर्मल नभ में उल्लेखित
साहित्य का चित्ताकर्षक चित्रण देखा
चंचल चंद्र की धवल किरणे
धरित्री को नहला रही थी
स्वछन्द उन्मुक्त पवन उनके
स्वागत के गीत गा रही थी
चपल चंद्र की रजत रश्मि
चित्त में चंचलता भर रही थी
भव्य भूतल पर मस्ती भरी
शुभ्र ज्योत्सना झर रही थी
कलित कौमुदी की द्योतना का
सृष्टि ने धरा था अनूठा आभूषण
पवित्र धोरिणी पर आगमन का
ईश्वर को था स्नेहरूपी आमंत्रण
चकोर चंद्र का वात्सल्य
घुल रहा था वातावरण में
शीतल स्नेह का प्रमाण था
प्रकृति के प्रत्येक कण में
गंभीर गूढ़ गगन में विचरित चंद्र
सुष्मिता के नए आयाम गढ़ रहा था
इस सकल संसार से पृथक उसकी
अपूर्व अलौकिकता को मैं पढ़ रहा था
मैं इस अतुल्य विहंगम दृश्य की
कमनीयता में पूर्णतः लीन था
मायामय भवजाल से विरक्त
स्वचित्त के संलाप में तल्लीन था
फिर अकस्मात आयी ऊषा किरण में
अद्भुत आदित्य का आचरण देखा
निश्चल निर्मल नभ में उल्लेखित
साहित्य का चित्ताकर्षक चित्रण देखा


