बारिश ने कोहराम मचाया
आँखों के सामने बचपन छाया
वो कागज़ की किश्तियाँ बनाना
वो घर का नाला याद आया
ये पेड़ पत्तो से गिरता पानी
याद आये पिंटू की शैतानी
कपडे उतार घूमता था
मस्ती में वो झूमता था
ये जोरदार बारिश का गिरना
घर की छत से पानी का रिसना
इधर उधर बर्तन लगाना
गद्दे गीले होने से बचाना
ये बादलो का यूं बरसना
बारिश में बाहर निकलना
वो पिताजी का आँख दिखाना
भीगने पे डाँट खाना
भाग कर माँ के पास जाना
उसके आँचल में छिप जाना
माँ की गोद में रखना सिर
क्या किसी से डरना फिर
उस घर की इन सब बातो से अंजान हो चला हूँ
अपने ही उस घर का मेहमान हो चला हूँ
उस शहर की यादो पर कोहरा छाने लगा है
अब मुझे ये नया शहर लुभाने लगा है
चार पैसे कमाने चला था
नाम बड़ा बनाने चला था
आज इस नए शहर का नूऱ हूँ मैं
लेकिन अपने उस घर से दूर हूँ मैं
अपने उस घर से दूर हूँ मैं


