जाने कितने घाव सहे हैं उसने अपनी पीठ पर
हमे बाबू जी का हर मुश्किल में मुस्कुराना याद है,
रो दिया वो फुट कर कोने में उस दिन सुन कर
कि तुम्हे हमारी खातिर किया ही क्या है?
जाने कितनी मशक्कत से पैसे कमाते थे वो हमारी ख्वाहिशो की खातिर,
हमे बस उनका अपने काँधे पर मेला घुमाना याद है...
राहुल समर


