अखबारों ने आग लगाई
सच्ची कड़वी खबर चलाई
उसको पढ़ कर सारे भड़के
सड़को पे फिर सारे निकले।
छोटे मोटे नेता आए
गला फाड़ वो रहे चिलाए
इंकलाब के नारे ऊचे
धरती और गगन सब गूंजे।
राजा फिर हरकत में आया
अखबारों को खूब डराया
अखबारों की खबरें बदली
राजा की तारीफे करती।
राजा सबसे मिलने आया
झूठे वादे करने आया
जनता भोली भाली जनता
समझ न पाई इतना जनता।
वादों के झूले में झूली
हक़ की बातें करना भूली
अब राजा जो भी करता है
वो अब निर्विरोध रहता है
अब अख़बार वहीं छपता है
जो राजा की सुन लिखता है
अखबारों की काली स्याही
राजमहल से आती स्याही
©राहुल मोलासी


