"खड़ खड़ जब खड़ाऊ बोलेगी

अवसाद सफर के खोलेगी

तब तुम अंजली नीर नयन भर कर रहना

उस त्रास व्यथा कथा को मूक सहना

मूक परमो धर्म धरा का

मूक आज संसार है

पथिक रुदन से पटा नभ है

चरण लहू संताप लिपिबद्ध कर रहा

धरा कर रही हाहाकार है।"

- राहुल लखेड़ा

Pic credit: Cartoonist Satish Acharya