शुबह से शाम तक

सफ़र कर के ,

सूरज भी सो गया है

थक कर के l

फिर स आग़ जलाने का

आरज़ू लेके,

शीतल हुआ आशमा जो

जल रहा था धू धू करके l

फिर से तपिश में

झुलसाने के लिए ,

हवा शबनमी है

आराम फरमाने के लिए ,

दिन भर की नाकामी

छुपाने के लिए ,

छत पे बैठा हूँ ख़ामोश

तन्हा सा खो जाने के लिये l


~राहुल बरियारपुरी