आदमी एक दर्द है दवा भी है
ज़िस्म के सतह पे दर्द कि
कई एक सिलवटें है
आखें वक़्त बेवक़्त नम
हुई जाती है l
रूह के सतह पे आदमी
हर मर्ज़ कि दवा है
इश्क़ में ये खूबसूरत है
जैसे मसीहा है l
दोनों दो अलग किनारें है
दोनों के बीच बहती
जिंदगी जैसे नदियाँ
के धारें है l
न मुक़म्मल इस पार
न उस पार
बिच में बहती दोनों से
मिलती और बिछड़ती
धार और किनारें है l
आदमी एक दर्द भी है दवा भी ll
~राहुल बरियारपुरी


