दरमियां रहें या हों मुझसे दूर
तुम्हारी नज़रें कुछ कहती हैं
ये चरागों की रोशनी
ये सूनी महफ़िल का शोर
तुम्हारे इत्त्र की महक कुछ कहती है
तुम्हारी नज़रें कुछ कहती हैं
कल रात खयालों में ना जाने कौन कमबख्त रहा
ख्वाबों ने जगाया होगा तुम्हे रातभार
कर लिया है अहद-ए-वफ़ा का वादा मुझसे
इन आँखों की सुखन ये कहती हैं
तुम्हारी नज़रें कुछ कहती हैं
तुम्हारी दीद से शहर में अफरा-तफरी मची है
उजाड कूँचों को फिर से रोशन किया तुमने
ये बेनाम गलियों का सूनापन
उस गली की हसीनाओ की जलन ये कहती है
तुम्हारी नज़रें कुछ कहती हैं
- © राहुल अभुआ


