'प्रेम' पर लिखना बेहद कठिन है,

ऐसा मैं समझता हूँ!

कोई इसे 'इश्क़' कहता है

कोई 'मुहब्बत'

कोई 'प्यार'

हर एक के लिए इसके मायने अलग है

इसकी परिभाषाएँ अलग है

जिस वजह से अक्सर ये बहस का विषय हो जाता है

पर नाम इसे कुछ भी दीजिये

कुछ शब्द-मात्र भर में

इसको समझ पाना बिलकुल वैसा ही है

जैसे 'फूल' बिना 'सुगंध',

बदलते समय के साथ इसकी परिभाषा बदली है

'प्रेम' के 'प्रेम' होने पर अंकुश लगते आये है

'सिद्धार्थ' के खुद की खोज में उठाये कदम

और 'यशोधरा' के जीवन में आये परिवर्तनो को

समाज का एक हिस्सा 'प्रेम' कहता है

तो दूसरा इस राय से भिन्न अपनी राय रखता है,

कुछ ऐसा ही विचार वो 'भरत' और 'मांडवी' के लिए रखते हैं,

'कृष्ण' को शारीरिक रूप से न पाने वाली 'गोपियो' से

अगर कोई पूछता कि 'प्रेम' क्या है

तो शायद वो इसकी सही परिभाषा दे पातीं,

लेकिन वो परिभाषा क्या आपके लिए भी 'सच' होती

या ये भी बहस का विषय बन जाता?

'प्रेम' करने के लिए हमेशा साथी का होना ज़रूरी क्यों है?

खुद से प्रेम करना भी तो 'प्रेम' ही है!

'मज़दूर' का 'मज़दूरी' करना 'प्रेम' क्यों नहीं हो सकता?

- © राहुल अभुआ (15-01-2021)