सुशान्त मर गया, गुरु दत्त, प्रेक्षा मेहता, कुशाल पंजाबी, श्रीनाथ, जिया खान, कुनाल सिंह और इन जैसे कई सारे मर गये...'आत्म्हत्या' कर ली। समाज एक ढर्रा कहता है 'आत्महत्या कायरो का काम है..' ये कहने वाले ऐसा तब कहते हैं जब वो पुरुष/औरत चला जाता है।
इसी समाज का दूसरा ढर्रा है जो इन आत्महत्या करने वालो पर अपना गंद और विचारधारायें थोपता है। जबतक आपको परेशान करने वाला वैश्यवृत्ति (जिसको मैं बहुत सम्मान के नज़रिये से देखता हूँ) या कोई बड़ा कु-कर्म न कर ले तबतक हम समाज के लोग उनके साथ घटित चीज़ को छोटी बात मानकर चलते है और ढ़ोते रहने पर मजबूर करते हैं उस बोझ को, हमारे लिए 'मानसिक प्रताड़ना' जैसी कोई भी चीज़ बेहद हल्की आँकी जाती है, 'ये तो होता रहता है' कहकर हम अक्सर इसे बढ़ावा देते है। ज़िन्दगी बर्बाद करवा लो मगर समाज के बनाए ढर्रे पर ही रहो..ये बिलकुल वैसा ही है जैसे हमें हमारा धर्म 'धर्म के ठेकेदार' समझाते है।
इन लोगो ने जिनके नाम ऊपर मेंशन किये या हर उस आत्महत्या करने वाले इंसान (जब मैं ये लिख रहा हूँ देश-दुनिया में तबतक न जाने कितने और आत्महत्या कर चुके होंगे) को समाज के इस रूप को पचाने में दिक्कत होती है, जो नहीं झेल पाते वो ज़िन्दगी ख़त्म कर लेते हैं, इसलिये नहीं की वो कायर होते हैं बल्की इसलिये क्यूंकी उन्हे दलदल में फंसा पाकर हम उनको जताते हैं कि 'दोस्त तुम यहाँ के नहीं हो..'
इस लेख का ये मतलब कतई नहीं की 'आत्महत्या' कोई अच्छी चीज़ है, बल्कि सिर्फ इस बारे में बात करना है कि समाज के ढ़र्रे के तौर पर आप खुदसे ये ठान लीजिए की इस तरह की चीज़ से झूझ रहे किसी पुरुष/स्त्री को 'ये तो होता रहता है' कहकर उसकी मानसिक स्तिथि को बार बार चोट नहीं करेंगे
#mentalhealthisimportant #letstalkmentalhealth


