कहानी - "रंगबाज हैमलेट"
('मैं शून्य ही सही" किताब के कुछ अंश)
21वी सदी है, संसार में त्राहिमाम-त्राहिमाम मचा हुआ है, सच्चे 'अभिनय' की बैंड बजी पड़ी है। कहीं आलम यूँ है कि जहाँ 'अभिनय' मौजूद है वहां 'अर्टिस्ट' नहीं, कहीं 'अर्टिस्ट' है तो 'अभिनय' नहीं और कहीं पर ऐसा है कि 'अभिनय' और 'अर्टिस्ट' दोनों नदारद हैं,
'हैमलेट' भी बेचारा परेशान है, उसे पाना कुछ था बस यूँ कह लो की किसी तरह वो इधर आ गया। रंगमंच सज चुका था, नाटक खुलने को था और हैमलेट अपनी लाइन्स याद कर बिलकुल तैयार लेकिन तैयारी अधूरी, वो यूँ की हैमलेट 21वी सदी का है तो इसके उसूल भी नये, हैमलेट का कहना है कि जिस राज-घराने से मैं हूँ वहां ये Costume, Make-Up, Props जैसी घटिया चीज़ो पर टाइम खोटी नहीं करते हैं हम, हम तो दूर तलक पहुँच गए पढ़े-लिखे Method (एक्टिंग) करने वालो में से हैं, इन-शार्ट बड़े वाले परिवार से..
तो भैया हैमलेट जी लाइन्स रटे हुए फुल तैयार बैकस्टेज पर लेकिन बिना किसी Costume, Make-Up, Props जैसी तुच्छ चीज़ो के
प्ले खुलता है और अंजाम आप जानते ही है....
अभी कल की खबर है की मियाँ हैमलेट अब कहीं भी देखे जाते हैं तो फुल Costume, Make-Up, Props हाथ में लिये उसी कैरेक्टर में घूम रहें है जैसा उन्हे तब होना था लकिन 'रंगमंच' का अब कहना है कि राज-घरानो से मैंने तौबा कर ली है, पर 'अर्टिस्ट' तो ठहरा 'अर्टिस्ट' वो तो दुनिया को दिखायेगा न की आखिर ये सारा किया-धरा 'विलियम शेक्सपियर' का है.....हाँ नी तो..
- राहुल अभुआ 'ज़फर'


