'शक्ति' क्या है?

क्या 'शक्ति' वो है जब

'शूर्पणखा' झूठे अहंकार में

अपने कुलवंश के शूरवीरो की गाथा गाये,

जिसे 'लक्ष्मण' शण मात्र भर में तोड़ दे

या फिर

'शक्ति' वो है जब

'राम' शालीनता से

दुराचारी 'रावण' का अहंकार मिटा दे?

राम 'बंधन' में थे पर 'बाध्य' कभी नहीं!

'बंधन' में होना और 'बाध्य' होना

दोनो अलग बातें हैं

ज़रूरी नहीं जो 'बंधन' में है, वो 'बाध्य' भी हो

इसे ऐसे समझिये,

हम पिछले पूरे साल घरों में बंद रहे

तो क्या वो 'बाध्यता' हुई?

नही! मेरा विचार थोड़ा भिन्न है

'प्रकृति' ने कुछ समय के लिए 'बंधन' में तो बांधा

हम घरों में 'कैद' रहे,

पर 'बाध्य' होना, ये इंसान पर निर्भर करता है

'बाध्य' हुए तो जीवित ही 'मर' जाएंगे

'बंधन' को अगर 'जेल' कहा जाए तो,

'राम', 'भगत सिंघ', 'बोस', 'मंडेला' व् अन्य

सब 'बंधन' में तो रहे

लेकिन 'बाध्य' कभी नहीं रहे,

दुराचारी 'रावण' और 'शकुनि' जब-जब

अपनी 'मर्यादा' के विपरीत पेश आते हैं

तो इन्हे वो 'बंधन' तोड़ देने होते हैं

और 'शांति' बहाल करनी होती है

तभी राम 'राजा राम' से 'मर्यादा पुरुषोत्तम राम' कहलाते हैं।।

'प्रेम' क्या है?

क्या 'प्रेम' वो है जब

एक 'शहंशाह' अपनी 'चौथी पत्नी' की याद में

एक 'मीनार' तामीर करवाये

और उसे बनाने वाले तमाम लोगो के हाथ सिर्फ इसलिए कटवा दे

ताकि वो अपनी 'कला' से उस जैसा

दूसरे कोई 'मीनार' ना बना सके?

या फिर

'प्रेम' वो है जब

एक दुर्गम जगह में रहने वाला दलित

एक पूरा 'पहाड़' चीर दे ताकि

दोबारा कभी कोई और उस विपदा से न जूझे

जिससे 'उसको' गुज़रना पडा!!

राह में 'पहाड़' तो ज़िन्दगी के हर मोड़ पर आयेंगे

'शक्ति' को समझ कर चीरते हुए

'कठोर' और 'दुर्गम' रास्ते पर चलना ही

'बाध्यता' को तोडना है।


"'शक्ति' ही तोड़ती है अहंकार 'दक्ष' का

गर न तोड़े तो शक्ति 'शक्ति' नहीं।

- © राहुल अभुआ।" (05-01-2021)

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