जब होती बुद्धि भ्रस्ट,

तब नर बन जाता दुष्ट

भाव बदलता पल-पल में,

और लगता देने कष्ट

नहीं समझता अपनों को भी,

गैरों की क्या बात करें,

मैं ही मैं रहता अपनी,

सद्गुण से रहता परे।

बातें करके चिकनी चुपड़ी,

खंज़र मारे पीठ पर,

चलता चालें धूर्त भरी,

रहता बनकर ढीठ भर। 

मैं ही जीतूं हर एक बाज़ी,

भले करुँ मैं कुछ भी उल्टा,

चोट लगे भले ही सब को,

तनिक फ़र्क नहीं मुझको पड़ता।