तुम क्या हो?

खंगालने की प्रवृत्ति?

सूचना की आवृत्ति?

ज्ञान का प्रकाश?

एक अनकहा काश?

ठन्डे चूल्हे में

सांस फूंकने का

सामान हो तुम?

क्या हो तुम?

 

गैर ज़रूरी ना होने की ज़िद्द हो

मृत्यु के परे एक हद्द हो

सरोते में फंसाकर

सुपारी काटने का मज़ा

कहीं तुम

गुलकंद में छिपी

मिठास तो नहीं हो?

 

स्वप्न के भीतर एक स्वप्न

हाँ तुम एक परछाई हो

इतिहास की

नहीं हो तो

खटमल का काटा

निशान नहीं हो

रेगिस्तान में पानी का

अभाव नहीं हो

 

कोमल तितली

क्रान्ति व्रांति

ईद का चाँद

बनारस की शाम

फूलों की महक

बच्चों की चहक

नज़ाकत नफ़ासत वगैरह वगैरह

ये सब तो तुम हो ही नहीं

 

एक हज़ार तुक्कों में

अगर एक पक्का नहीं हो

तो सुनो

बंधन-वन्धन तोड़ कर

ज़माने के

आग-वाग लगा कर

अफ़सानों के

चलो मेरे साथ

एक सफ़र पर चलो

जहाँ तुम्हारी एक झलक भी

नज़रों से होगी ना ग़ुम

शरबत बनाकर पीएंगे

और बात करेंगे

क्या हो तुम