तू ही नींद है तू ही ख्वाब है।
तू ही दरिया है तू ही आब है।।
तू शराबी है तू ही साकी है।
तू ही मयख़ाना तू शराब है।।
तू ही इश्क़ है तू ही कशिश है।
तू ही हुस्न तू ही शबाब है।।
तू ही पीर है तू ही खुदा है।
तू ही बन्दगी तू आदाब है।।
तू ही रहनुमा तू ही रहगुजर।
तू ही राही तू ही नवाब है।।
तू ही माशूक़ तू ही माशूका।
तू ही तिश्नगी तू हिजाब है।।
तू ही गीत है तू ही ग़ज़ल है।
तू ही शायरी की किताब है।।
~राघवेंद्र सिंह 'रघुवंशी'


