मैं द्रौपदी हूँ
हाँ वही
जो कहलाई जाती है,
पाँच पतियो की पत्नी
माता कुंती की कुलवधु
इंद्रप्रस्थ की रानी
और अग्निकुंड से जन्मी हुई वो
द्रोपद् कन्या
जिसकी लाज ना बचा सके,
उसके पांच शूरवीर पति
ना पिता
ना अग्निकुंड की अग्नि
ना माता कुंती के मंत्र
और ना ही वो रानी का बेअर्थ सा सिंघासन,
जिसे लाया गया था पिटकर, मारकर उन शुरवीरो से भरी सभा में,
जिसे आसान भी तो कहाँ मिला दुर्योधन की जंघा पर,
जिसे भरी सभा में कुंती पुत्र कर्ण ने वैश्य कहा और कहा दुशासन से की इसे निर्वस्त्र कर,
मैं हाथ जोड़ कर माँग रही थी सबके आगे भिक्षा,
पर कोई ना उठा ना पितामाह भीष्म, ना कुलगुरु द्रौणाचार्य, ना धर्मराज युधिष्टर् करने मेरी रक्षा.
जो मेरे साथ हुआ वो भी तो अनर्थ था,
पर वहाँ बैठे पुरषो के लिए मेरे सम्मान से ज्यादा अपनी प्रतिज्ञा और धर्म का अर्थ था
मैं एक टूक होकर देख रही थी अपने पांचो स्वामी
हाँ, यह वही शूरवीर हैं जिन्हे जगत कहता है नामी
मैं स्त्री थी इसलिए अपनी पांचाली को जुये में उन्होंने हार दिया,
और उस एक क्षण में उन्होंने अपनी ही द्रौपदी को अंदर ही अंदर मार दिया
वहाँ बैठे वीरो की वीरता का क्या हूँ गया था मरण,
जो वो चुप होकर देख रहे थे अपनी ही कुलवधु का चीरहरण
दुशासन ने जो साड़ी पकड़ी सब कुछ अब मैं भूल गई,
अपने कृष्णा को याद कर भक्ति में अब मैं लीन हुई,
और दस गज मेरा वस्त्र पड़ा
मुझे निर्वस्त्र करना दुशासन के लिए भारी पड़ा,
छोड़ उसने साड़ी अपने हाथ उपर किये
और इस प्रकार अपनी कृष्णै की रक्षा करने भगवान श्री कृष्ण वस्त्र के रूप में प्रकट हुए,
परंतु
परंतु, मैं हुई हूँ विभाजित, अपमानित, कलंकित
यह मैं शायद ही भूल पाऊँगी
वहाँ बैठे स्थिर शुरवीरो को मैं कभी क्षमा नही कर पाऊँगी।।


