सुबह खिली हो कोई किरण या पुष्पों की तुम माला हो सुरभित मंद समीरण मेरे मन की तुम सुरबाला हो केश राशि है मानो ज्यो सारे बादल हो इनसे बने रूप ज्योत्स्ना सा तेरा है कोटि चंद्र है मुख से जने मृगनयनी से तेरे लोचन लालयत करते मुझको माथे जो बिंदी है तेरे सब तारामंडल उसमें सने सुर्ख अधर बहकते मुझको मदिरा का तुम प्याला हो सुरभित मंद समीरण मेरे मन की तुम सुरबाला हो चंदन बदन तुम्हारा प्रियवर, सुंदर छावी समाई है नयनों की है बात निराली , सागर सम गहराई है मनमोहक गिरी सी तुम लगती आसमान से आई हो देख तुझे पागल दिल होता , तू प्यार भरी पुरवाई है देवलोक से रुनझुन आती , प्यारी सी मधुबाला हो सुरभित मंद समीरण मेरे मन की तुम सुरबाला हो रूप निराला लगता तेरा, चाँद सी आभा जगाये हो सन्यासी मेरे इस मन मे प्रिय दर्श से प्रेम जगाये हो मेरी आँखों की पुतली सम प्यारी हे सुकुमारी सुन सुप्त भाव जो दिल मे मेरे उनको तुम ही जगाये हो बैठी तुम मधुवन में अकेली लगती तपसी बाला हो सुरभित मंद समीरण मेरी मन की तुम सुरबाला हो चलती हो कुंजन में जब तुम तितली सी बलखाती हो सागर से मिलती हो जाकर गंगा सी लहराती हो कर्ण प्रिय ध्वनि पद चापो की मिश्री सी घुल जाती है मनमोहक हो जाता है मन कोयल सी जब गाती हो बिन मदिरा मद चढ़ा रही हो ऐसी तुम मधुबाला हो सुरभित मंद समीरण मेरे मन की तुम सुरबाला हो इंद्र देव का आसन डोले उस रंभा सी प्यारी हो स्वर्ग लोक से भू पर आती गंगा जैसी न्यारी हो चूड़ी खन खन पायल रुनझुन करती हरपल तेरी है काम देव की रति सी मुझको लगती तुम अधिकारी हो अंधेरे भू पर तुम ज्योतिर मन का कोई उजाला हो सुरभित मंद समीरण मेरी लगती तुम सुरबाला हो मालियगिर सी महक रही हो कंचन देह तुम्हारी है आँख है काली,काली है भौह काली लट ये प्यारी है रुख की कांति निराली इतनी ये तो चाँद लजाती है तुझसे अब क्या और कहूँ मैं तू सपनो की अधिकारी है नख से सिख तक लगती मुझको यौवन की मधुशाला हो सुरभित मंद समीरण मेरी लगती तुम सुरवाला हो मृदुवाणी से जब तुम प्यारी गीत सुरीला गाती हो मधुवन में चुपके चुपके तुम ऋतुपति को ले आती हो बागों में चुप्पी छा जाती कोयल भी शरमाती है पुष्प खिले हर ओर जगत में बोर रसाल पे लाती हो सारी बसुधा दुल्हन हो जाती मानो रंग को डाला हो सुरभित मंद स मीरण मेरी लगती तुम सुरवाला हो
ऋषभ तोमर
