खुले गगन की शैर करो तुम

जहाँ शरहद का कोई नाम नही

रिक्त उदर मे आग लगे तो

आ जाओ मेरे घर आँगन में

देखो लगा दी मैने बेर,बबूल का पेड़

अब न रखो तुम इस दिल से बैर

कर लो तुम फिर इन पर ठिकाना

इन पौधों को है अब नही कटना