मेरी फकीरी को मेरी औकात समझते हैं

वो जो जुगनू को आफताब समझते हैं।


ऐसों को हम रास आए भी तो कैसे

मक्खियां कहां बैठती हैं सब समझते हैं!


मशरूफियों के नाम पर नजरे चुराने वाले

बदलते वक्त की तल्खियां हम समझते हैं


तकब्बुर का अंजाम किसे कौन समझाए

पतंगे आग में गिरते हैं तब समझते हैं!.. (राही रमेश)


#शब्द ज्ञान 1-आफताब-सूर्य

2-मशरूफियों- व्यस्तताओं

3-तकब्बुर-घमंड