इतनी उजली है मन में स्मृति तुम्हारी
अँधियारो मे दिखती है आकृति तुम्हारी
जीवन के छण-छण खोने में क्या रखा है
पल भर तेरा होने को व्याकुल नियति बेचारी!
संकुचाते शब्दों से कुछ कुछ कह पाना
परिणामो के भय से अधरों का रुक जाना
जग प्रपंच से प्रेम सहम जाता है अक्सर
चाहे मन को मिल जाये जितनी स्वीकृति तुम्हारी!
देर रात तक अंतर्मन में जलते जलते
नींदों को बिसरा करके खुद को दीपक करते
अँधकार में रोशन होना पड़ता है
शायद ऐसी ही होती है प्रकृति हमारी!
मेरी दुविधा ये है के मैं पर्वत सा अविचल
और तुमको जाना है सागर तक चल
इन मतभेदों का दोषी मैं हूँ या तुम
शायद ना हो पाए इस पर सहमति हमारी!


