तुम्हारी परिभाषा क्या दूँ?

तुम सहज हो और मौन।

तुमसे ही मेरा प्रेम परिभाषित होता है,

मैं आतुर रहता हूँ सुनने को,

तुम, हाँ तुम, लगते सर्वस्व... और कौन?


शब्द थक कर लौट आते हैं किनारे से,

तुम वो सागर हो जिसकी कोई सीमा नहीं।

मैं शून्य सा तुममें समाया हूँ ऐसे,

कि अब मेरा कोई पृथक अस्तित्व नहीं।


दुनिया के शोर में तुम इक सुकून बन मिले,

बिन कहे जो समझ ले, वो गहरा एहसास हो।

ढूँढता था जिसे यह मन हर चेहरे में अब तक,

तुम ही मेरी मुकम्मल दुआ, आत्मा की प्यास हो।