लिख सकता नहीं उसे, तो छोड़, बता किस पर लिखूँ?

पढ़ता हूँ हर एक चेहरा, बता उन पर मैं क्या लिखूँ?


बनावटी बातें लिखूँ या झूठी कोई तारीफ़ लिखूँ?

भीड़ के इस बाज़ार में, बता किसकी क्या हकीकत लिखूँ?


हर शख्स ने चेहरे पर एक चेहरा लगा रखा है,

कोई हँसता है दिखावे को, कोई गम छुपाता है।


आईना सच तो कहता है, पर मैं उसे मानता नहीं,

सामने अपना ही चेहरा है, पर मैं उसे जानता नहीं।


मुखौटों के सजे इस बाज़ार में, खुद को भी खो दिया,

मैं आईना तो देखूँ, पर बता किसे अपनी सूरत लिखूँ?