अजीब है न?

अब कुछ पाने की कोई चाहत नहीं।

न वक़्त से कोई शिकायत है,

न कोई नाराज़गी,

बस ये जान लिया है कि...

हर कहानी का अंत 'साथ' नहीं होता।

कभी-कभी कमी खलती ज़रूर है,

पर अब यादों से तकलीफ़ नहीं होती।

अब न हाथ बढ़ाते हैं,

न ही आवाज़ देते हैं,

क्योंकि कुछ दूरियाँ बोलना छोड़ देती हैं,

वो बस एक ख़ामोश सुकून में ढल जाती हैं।