मैं आज नहीं,
कल में जीता हूँ,
ढूँढता हूँ खुशियाँ बीते कल में।
नहीं उत्सुकता कोई,
आने वाले कल के बारे में जानने की।
चाहता हूँ कुछ ठीक करना,
आने वाले कल में।
ग़लतिया कुछ हुई उनसे सीखना,
बीते कल के लम्हों में,
कुछ ख़ुशी मिलती है।
मैं बस अपने 'अतीत' को जानता हूँ,
भविष्य में नहीं मानता हूँ,
मैं अपने 'भूत' का मुसाफिर हूँ,
उसे ही सच मानता हूँ,
जो आया ही नहीं,
उस 'भविष्य' को मैं कहाँ जानता हूँ।
