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विषधर न बनो !

R N ShuklaR N Shukla September 23, 2022
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तुम हो प्रबुद्ध !
ना जाने क्यों ? हो रहे क्रुद्ध !
मन की ज्वाला को शांत करो
हे कुटिल ! क्रुद्ध ! मानव –
विध्वंसक !

अपने मन की तुम तजो आग !
कुछ करो  काज ऐसा  जग में 
अपकीर्ति न हो जग-जीवन में
सुन्दर हों  तेरे  कर्म सकल !
उत्तम भावों का हो प्रसार !

तुम मानव हो !
छोड़ो मन से सब घृणा–पाप !
बन बुद्ध ! प्रबुद्ध औ' शुद्ध भाव !
मन में  न रखो तुम मोह – द्रोह !
तज दो  मन से सब  बैर -भाव !
सम में स्थिति सबमें अनुराग !
छोड़ो  हृद से  गन्दे – विचार !

हे मानव !
विषधर न बनो !
विषम भाव हैं–व

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