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" श्रम का विवर्तमय पथ "

R N ShuklaR N Shukla July 1, 2022
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हे  कृषक !
धरा के आदि प्राण !
श्रम को है ,साधा तुमने ,
हर  बाधा को दूर किया ,
एक केन्द्र में कर वर्तन !
श्रम-मूल भावनाओं को भर –
श्रम के अनन्त पथ - विंदु 
समेटे चलते हो !

तेरे श्रम की प्रचण्डाग्नि में 
प्रतिकूल भाव हैं जल जाते !
तेरे श्रम के उत्पन्न अन्न से –
प्राणी हैं शोभा पाते !

ओ ! महत् हृदय ! 
श्रम  के  मशाल !
जो भी जितना श्रम करता है 
उसको उतना फल मिलता है
पर , नहीं मिला प्रतिदान मनोहर –
तेरे श्रम का !

तेरा जीवन कितना दुर्वह !
श्रम के घोर विवर्तन ! वर्तन में !
हो  स्वत्वपूर्ण घूमता रहा !
शतघूर्ण बना ! आघूर्ण बना 
पर , नहीं हुआ उन्मोचन !
तेरे  जीवन  का !
श्रम के विवर्तमय पथ पर , तू–
चलता ही रहा , नहीं रुका –
क्षण भर भी !

ओ ! कृश गात ! 
वंदित हैं तेरे कर्म सकल !
प्रेम-सुधा ! बरसाते तुम हो 
नित मङ्गल के गीत तुम्हीं गाते हो !
तेरे  जीवन में –
कब होगा

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