सोचल समझल सब छूटि गईल

अब सोचे समझे के का बा?

जिनगी हमनी के लूटि गईल

जनता के 'मनवा' टूटि गईल...


देशवा की मर्यादित संसद में जाके

आपन असली चेहरा देखलवलें

जीति के ई सांसद हो गइलें

'पद' पवते ई लोग पागल भइलें...


केहु फारत बा, केहु डाँटत बा

केहु केहूके गलियावत बा

केहु छिपत बा, केहु भागत बा

बाति के केहू ना बूझे–

सभे आपस में जूझत बा।


मैदान छोड़ि काहें भगलें 

जनता इनसे ई पूछति बा

जनता के बाति सुनत नइखें,

करते जाता लोग मनमानी,


बेईमानी में ई लोगनि के परान बसे,

जनता के पईसा, पानी नियर बहे।


संसद के शरमसार कइके

धो दिहलें, भारत कऽ पानी।


ए भइया! ई केहू क ना होइहें

आपन-आपन ढ़ोल बजइहें

एह लोगन की ढ़ोल प नचलऽ तऽ

जिनगी भर नाचत रहि जईबऽ।


जितले पर आपन उदर भरिहें

तोहके फूटलो कऊड़ी ना दीहें।


तू अइसन सुघर बाति सुनऽ

अपनी मतिभ्रम के दूर करऽ

बूथे पर जाके 'वोट' करऽ

एह लोगन प 'अंतिम चोट' करऽ।