मैं ही हूँ वह शक्ति -
जिसे शिव करते धारण।
मैं ज्ञानी विज्ञानी मैं ही।
तेरी श्वासों में मैं बसती,
तेरी बातों में मैं रुचती,
मैं ही यज्ञों में प्रथम सूपुजित!
मैं भरती उर में नव-विचार,
तूने अपनाया कदाचार,
मैं श्रद्धा हूँ, मैं ही प्रज्ञा,
मैं ममता हूँ, कोमलता हूँ,
मैं ही सृष्टि का प्रथम बीज,
सुन्दर – विचार !
मैं हूँ माटी की गंध-पूत,
तू है गंदे जल का कीड़ा,
क्या नहीं तुझे तनिक व्रीडा?
सम्भल-सम्भल हे! नर-कपूत,
तू नहीं बना माँ का सपूत।
तू हृदय हीन, करुणा विहीन
मैं हूँ पवित्र गंगा जल,
तू मनुष्यता पर बन कलंक,
बनता जाता उत्श्रृंखल,
मैं धोती वसुधा का तल।
मैं शील-पुञ्ज,
तू पतित नराधम,
मत कर, तू अपमान मेरा ,
हो जाए'गा तेरा गर्व चूर।।


