'मौन' की भाषा निराली
मुखर हो अब बोल आली
'मुखर बोल' जन-जीवन में
आलोक सृजन करता है
प्रभु का यह उपहार शाश्वत
विश्व-मानव को मिला है।
अक्षरों के बीच पलते
मौन के जज्बात पढ़ते
दिन व सारी रात गिनते
मर गए हैं स्वप्न जिनके
स्वर-सुरों को जान आली!
आ अभी से बोल वाणी
मुखर हो अब बोल आली!


