दफ्तर में करता हूँ सर्विस

पाता हूँ मासिक वेतन,

करता हूँ काम जिसके मिलते हैं दाम,

क्षण-भर भी नहीं करता आराम।


बचपन से ही सुनता आ रहा हूँ–

'ईमानदारी' की नींव पर

खड़ी इमारत कभी गिरती नहींजैसे कि–

बचपन के संस्कार कभी मिटते नहीं।

पर,युग बदल गया

साथ ही मुहावरे भी बदल गए

अब 'बेईमानी' से अर्जित धन की आयु–

दस वर्ष तक ही नहीं

कई पुश्तों तक रहती है स्थिर।


क्योंकि मैं देख रहा हूँ–

"राजनेताओं" की कमाई–

कभी नहीं होती खत्म

उनकी पुश्तें दर पुश्तें ,

बिन कमाए ही करती हैं ऐश     


इसलिए बेईमानी की नींव पर-

एक बदसूरत ही सही, मगर

एक मजबूत 'घर' बनाना चाहता हूँ।


जनाब! मेरी जरूरत है – घर बनाने की,

उनकी ही तरह बच्चों को–

महँगे स्कूल में पढ़ाने की,इनका भविष्य सुंदर बनाने की।।


अतः जल्दी-जल्दी कुछ खा-पीकर

भागता हूँ आफिस,

कहीं खा न जाएं अन्य    

मेरे हिस्से का धन 

इसलिए–

सबसे पहले पहुँचने की रहती है धुन।


उसी समय आते हैं मुर्गे–

कुछ छोटे 'डील' वाले,

कुछ बड़े 'डील' वाले,

कुछ हाई 'हिल' वाले।


मजबूरी इधर भी, मजबूरी उधर भी।

उन्हें गलत काम कराना है,

मुझे अपना घर सवाँरना है।

इसलिए मैं भी बेईमान हो गया हूँ।