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छोड़! मौन की भाषा

आओ हम सब मिलकर बोलें–

जीवन के यथार्थ की भाषा

जिसके अन्तस में बसती हो

विगलित जीवन की परिभाषा

मत बोल! मौन की भाषा।


जिन्होंने सबका पेट भरा

उनको भी जीने का हक है

क्यों भूल गए सुख-साधन में

इनके जीवन का सुख-दान!

रे नादान!

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