छली गई मैं ......
बारम्बार, सारा दिन व सारी रात
उसकी मीठी-मीठी भाव-भरी बातों मेंआकर
घातों-आघातों से कितनी–
छली गई मैं......
मूक बनी रहती,कुछ कह नहिं पायी–
ये कैसी थी मजबूरी?
होठों तक आ आकर बातें–
पता नहीं कैसे रुक जातीं
बातें सब मन ही में रह जातीं
शायद, दिल के आगे हारी।
छलती हुई ढ़लती गई
जो थी नहीं बनती गई
फिर भी, मैं हूँ वही।
अब सोचती हूँ –
व्यर्थ मैंने चित्र खींचा
तुम बड़े विचित्र!
काश! पहले जान पाती,
मैं तुम्हें पहचान पाती,
क्यों बनाती सप्तरंगी चित्र ?


