अपना गाँव!खेत-खलिहान!
सुन्दर शाम ! सुंदर  विहान!

गाँव के मंदिरों से उठती 
पूजा की शंख-ध्वनि

गाँव की हैं ये शान !
खेत और खलिहान!

किसानों की जान–
खेतों में लहलहाते धान!

सुनहली धान की बालियाँ !
मन्द-मन्द पवन संग करती अठखेलियाँ !
बालियों पर मँडराते पतंग-तितलियां!

सुभग-विहग चहचह करते उड़ते जाते
खेतों के ऊपर अद्भुत छटा बनाते
चीं चीं चूँ चूँ कलरव करते –
उड़ते ही जाते....

ये सब तितलियां, 
पतंग-विहंग!
रहते हैं हमारे संग!
सहचर हैं मित्र हैं।

और भी गाँव के चित्र हैं–

यहाँ सब आपस में
छोटे–बड़े भाई हैं

बड़े हैं छोटे हैं,मंगरु-झगरू हैं
फज़ले हैं–प्यारी मीठी गजलें हैं !
हास है, परिहास है! 
खैर छोड़िये–ये सब
आपस  की  बात है!

कभी-कभी आपस में–
लड़ते-झगड़ते हैं,फिर भी–

संगी-सँघाती हैं 
दुर्दिन के साथी हैं

इनसे हम सब का,
बड़ा गहरा नाता है

जटिल समस्याओं 
और पर्यावरण के –
ये महान ज्ञाता हैं!

खेतों से लौटते हुए–
पोखरे के पास हरी-हरी घास के–

मखमली गलीचे पर थोड़ी देर बैठ–
निहारने लगा –अद्भुत सौंदर्य!

पोखरे का ठहरा जल!
मन्द-मन्द बहती वायु!

सिहरन-सी दौड़ गई! फिर–

बचपन की भूली-बिसरी 
स्मृतियाँ कुछ कौंध गईं!

एक मीठा दर्द! और –
जीवन का गर्द!
घण्टों तक सालता रहा...

फिर सामने–
वही पोखरे का शान्त जल!

उस पार से इस पार तक–जल पर–
शिथिल सूरज की फैली हुईं–
सुनहली रश्मियाँ!
जल में वृक्षों की छायाएं!

अद्भुत रूप-रंग में डूबती हुई शाम!
पश्चिम में धीरे-धीरे अस्त होता सूर्य!

अपनी फैलाई हुई–स्वर्ण-रश्मियों को
समेटता जाता सूरज!

जैसे जीवन और मृत्यु का शाश्वत क्रम!

अब शान्त हो गए हैं –
पक्षियों के कलरव!
मनुष्यों के शोर!
दिनभर का कोलाहल!

क्षणभर में बदल गया 
सुंदर परिदृश्य!

वैसे ही जैसे –
बदल जाता है जीवन!

धीरे-धीरे स्याह हो गया पोखरे का रंग!
और छा गई शांति ही शांति सर्वत्र! 

सभी पशु-पंक्षी जा चुके घरौंदों में
मैं भी अब चलूँ अपने बसेरे की ओर...