जो कहते हैं कि -

"किताबों में क्या रखा है? 
कभी आँखें भी पढ़कर देखिये।"

वो सुनें कि -

"लफ्ज़ भरे पड़े हैं इन किताबों में, 
जो बरबस ही मेरी आँखों में छलकने लगते हैं। 
मगर आपकी आँखें, 
बिल्कुल सूनी। 

जाइए कुछ लफ्ज़ भरिये इनमें। 
इतने कि बहने लगें कभी-कभी।"

- सिया